नाबालिगों के सोशल मीडिया के उपयोग को नियंत्रित करने और माता-पिता की अनिवार्य सहमति लागू करने की मांग वाली जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि डिजिटल माहौल में बच्चों की सुरक्षा के लिए मजबूत दिशानिर्देशों की आवश्यकता है और उसने केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया है।


मैंने पार्क में कुछ बच्चों को देखा। उनके हाथों में मिट्टी या खिलौने नहीं थे, बल्कि उन सभी के चेहरे मोबाइल स्क्रीन की रोशनी में डूबे हुए थे। यह देखकर मुझे उन दो लड़कियों की याद आ गई, जिन्होंने अपने पसंदीदा 'के-पॉप' गायक बनने की चाह में 'पिंटरेस्ट' और भाषा सीखने वाले ऐप के जरिए ब्रेनवाश किए जाने के बाद घर छोड़ दिया था और जिन्हें बांग्लादेश राज्य की सिलीगुड़ी सीमा पर बचाया गया था; इस घटना ने मेरे मन को झकझोर कर रख दिया। प्यार के उपहार और सुविधा के रूप में हम जो स्मार्टफोन खरीदकर देते हैं, वे वास्तव में श्रम शोषण को पार करते हुए मासूमों के भविष्य को ही सोखने वाले यमराज बन गए हैं।

किसी भी सोशल मीडिया पर खाता खोलने से पहले, हम स्क्रीन के कई पन्नों पर दिखाई देने वाली 'सेवा की शर्तों' को सामान्य तौर पर स्वीकार कर लेते हैं। लेकिन, सड़क पार करने में ही लड़खड़ाने वाला एक बच्चा इन जटिल कानूनी अनुबंधों को कैसे समझ सकता है? भारतीय अनुबंध अधिनियम के अनुसार, मोहरी बीबी मामले में सौ साल पहले ही कानून ने स्पष्ट रूप से परिभाषित किया है कि बहुमत की उम्र (18) तक नहीं पहुंचने वाले नाबालिगों द्वारा किया गया कोई भी अनुबंध शुरुआत से ही अमान्य है। ऐसा होने पर, 'जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रन अलायंस' एनजीओ की ओर से वकील सक्षम माहेश्वरी के माध्यम से वरिष्ठ वकील एच.एस. फूलका ने सुप्रीम कोर्ट में जोरदार दलीलें पेश करते हुए पूछा कि फेसबुक, इंस्टाग्राम, स्नैपचैट जैसे प्लेटफॉर्म बिना किसी वास्तविक आयु सत्यापन के स्वेच्छा से दर्ज की गई जन्म तिथि के आधार पर ही (13) वर्ष के नाबालिगों को कैसे अनुमति दे रहे हैं।

इस महत्वपूर्ण मामले की सुनवाई करते हुए मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत, न्यायाधीश जॉयमाल्या बागची और वी. मोहना की पीठ ने मौखिक रूप से टिप्पणी की कि नाबालिगों की सुरक्षा के लिए डिजिटल सुरक्षा कवच की आवश्यकता है, और इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय, कानून और श्रम कल्याण मंत्रालयों को आधिकारिक नोटिस जारी करने का आदेश दिया। इस मामले की अगली सुनवाई आगामी 25 सितंबर को होगी।

अकेले एक अंधेरे कमरे में बैठकर, अज्ञात व्यक्तियों की धमकियों को देखकर आंसू बहाते हुए मोबाइल स्क्रीन को घूरने वाले कई नाबालिगों की दुर्दशा राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों में स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। पिछले 2017 में नाबालिगों के खिलाफ साइबर अपराध के मामले जो केवल 7 थे, वे कई गुना बढ़कर 2019 में 164, 2020 में 842, 2021 में 1,376 और 2022 में 1,823 का विकराल रूप ले चुके हैं। और इसमें भी विशेष रूप से, एक हजार से अधिक मामले साइबर पोर्नोग्राफी (अश्लीलता) से संबंधित हैं, जो हमारे सोशल मीडिया उपयोग के काले चेहरे को दर्शाता है।

इस याचिका का उद्देश्य तकनीकी विकास का हवाला देकर बच्चों को इंटरनेट से पूरी तरह से अलग करना नहीं है, बल्कि मुख्य मांग यह है कि डिज़ाइन में ही उनके लिए एक सुरक्षा कवच बनाया जाना चाहिए। ऑस्ट्रेलिया में (16) वर्ष से कम उम्र के नाबालिगों पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया गया है और नियमों का उल्लंघन करने वाली कंपनियों पर जुर्माना लगाया जा रहा है। भारत में 2023 के डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम के अनुसार, (18) वर्ष से कम उम्र के सभी लोगों को नाबालिग के रूप में परिभाषित किया गया है, और उनके डेटा का उपयोग करने के लिए माता-पिता की सहमति अनिवार्य कर दी गई है। डिजिलॉकर आयु टोकन जैसी तकनीकों का उपयोग करके इसे सत्यापित करने के नियम आगामी 13 मई 2027 से लागू होने वाले हैं। इन नियमों का उल्लंघन करने वाली कंपनियों पर प्रत्येक उल्लंघन के लिए 200 करोड़ रुपये से लेकर अधिकतम 250 करोड़ रुपये तक का जुर्माना लगाए जाने का प्रावधान है; यह उम्मीद की जा सकती है कि यह स्थिति आने वाले समय में इंटरनेट की दुनिया को हमारे बच्चों के लिए थोड़ा सुरक्षित बनाएगी।