इंसान के पास अपने किए गए कार्यों के सही या गलत होने का आकलन करने की एक अद्भुत तार्किक क्षमता होती है। जब हम खुद को सही मानते हैं, तो हम उत्साहित होते हैं। अच्छे विचार जन्म लेते हैं। अच्छे विचारों से अच्छे काम होते हैं। इससे हम जीवन में और आगे बढ़ते हैं। गलत होने पर हम अपराधबोध महसूस करते हैं। बुरे विचार हावी हो जाते हैं। यह व्यक्तिगत विकास को रोकता है। ऐसा होना मानवीय स्वभाव है। मेरा हमेशा से यह मानना था कि अपनी गलती पर अपराधबोध महसूस करने वाला व्यक्ति कभी कोई क्रूर काम नहीं कर सकता। लेकिन मेरा वह विश्वास टूटने का एक पल आ ही गया।
भारत में, तमिलनाडु राज्य के तूतीकोरिन के पास अलंगाराथट्टू गांव की रहने वाली कृष्णम्माल का बयान सुनने वाले किसी भी व्यक्ति पर गहरा मनोवैज्ञानिक प्रभाव डालेगा। एक ओर, इंसान यह मानता है कि वह अपने कार्यों का मूल्यांकन कर सकता है और अच्छे विचारों को विकसित कर सकता है। लेकिन दूसरी ओर, सत्ता के नशे में चूर होकर कुछ लोग अमानवीय कृत्य भी कर सकते हैं, कृष्णम्माल की गवाही हमें यही जोर-शोर से बताती है। उनके जीवन में सत्ता का दुरुपयोग और अमानवीय कृत्य एक साथ घटित हुए हैं। कृष्णम्माल के पति को प्रताड़ित करने वाले पुलिसकर्मी किस मानसिकता में रहे होंगे, यह समझ से परे है। लेकिन, उनके कृत्य किसी भी तरह से उचित नहीं ठहराए जा सकते।
कृष्णम्माल का एक-एक शब्द एक आम इंसान के दर्द भरी चीख की तरह गूंजता है। पति को पकड़ कर ले जाने से लेकर, उनके शरीर पर चोट के निशान देखने तक, पुलिस स्टेशन में ही उनकी जान निकल जाएगी ऐसा कहने से लेकर, उनकी आंखों के सामने पति को छत पर घसीट कर ले जाने और प्रताड़ित करने तक, हर एक दृश्य दिल दहला देने वाला है। तत्कालीन एसआई (SI) और वर्तमान डीएसपी (DSP) रामकृष्णन की अमानवीय बातें और कृत्य यह दर्शाते हैं कि सत्ता के शिखर पर बैठा कोई भी व्यक्ति कितना बड़ा क्रूर दरिंदा बन सकता है।
पति की मृत्यु के बाद, अस्पतालों के चक्कर काटती कृष्णम्माल की तड़प को शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता। अपने पति के साथ हुई ज्यादती की एक ही दिन में गवाह बन चुकी उस महिला से पुलिस ने कहा कि तुम्हारे पति की मौत दिल का दौरा पड़ने से हुई है, इससे यह साफ समझा जा सकता है कि उन्होंने अपनी गलती को छिपाने की किस हद तक कोशिश की थी।
छोटे बच्चों को लेकर उन्होंने जो दर्द सहा और सालों तक न्याय के लिए उनका जो संघर्ष रहा, वह हमें गहरी सोच में डाल देता है। एक समय पर सरकार द्वारा दिए गए मुआवजे को ठुकरा देना, शायद उनके इस दृढ़ विश्वास को दर्शाता है कि पैसे से ज्यादा न्याय महत्वपूर्ण है, या फिर यह पति को खो चुकी उस महिला का अंतिम बहिष्कार भी हो सकता है।
सत्ता में बैठे लोग जब अपनी जिम्मेदारी को समझे बिना काम करते हैं, तो उसके क्या परिणाम होते हैं, वह इसका जीता-जागता सबूत हैं। भले ही हम मानें कि इंसान के पास तर्क और अंतरात्मा होती है, लेकिन कभी-कभी ऐसी घटनाएं घटती हैं जो उस विश्वास को चुनौती देती हैं। कृष्णम्माल की न्याय की लड़ाई 25 साल बाद कल पूरी हुई।
डीएसपी रामकृष्णन समेत 9 लोगों को कल (5-4-2025) तूतीकोरिन कोर्ट ने उम्रकैद और 10-10 हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई। 25 साल पहले एसआई रहे रामकृष्णन डीएसपी बन गए। एक अन्य एसआई इंस्पेक्टर बन गया। बाकी 7 लोग पुलिस की नौकरी पूरी करके रिटायरमेंट के बाद घर पर आराम फरमा रहे थे। अब इन 9 लोगों को जेल में डाल दिया गया है।
1999 में हुई यह घटना 24 साल तक अदालतों में बिना सुनवाई के पड़ी रही, जिसे पिछले साल 2024 में तूतीकोरिन की पहली अतिरिक्त अदालत में सुनवाई के लिए लिया गया और कल इसका फैसला सुनाया गया।
बम ब्लास्ट मामले में पूछताछ के लिए लाकर, कानून की पढ़ाई किए हुए और ट्रेनिंग प्राप्त अधिकारियों ने पुलिस स्टेशन में रखकर कैसे किसी की जान ले ली? क्या उन्हें जरा भी अपराधबोध नहीं हुआ? जब मैं इस सदमे में सुन्न था, तभी मेरा एक साथी रिपोर्टर यह कहते हुए पहाड़ों की यात्रा पर निकल गया कि 'बिना कोई खबर मिस किए देख लेना'। तभी मैं एक ऐसे नतीजे पर पहुंचा जिसने मुझे खुद हैरान कर दिया। इन सभी अपराधबोधों से इन इंसानों को बचाने वाली एकमात्र चीज़ भगवान पर उनका विश्वास ही है...
